भैरव अवतार कथा

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भैरव जी के पांचवे अवतार की कथा

भैरव का अर्थ होता है भय का हरण कर जगत का भरण करने वाला। ऐसा भी कहा जाता है कि भैरव शब्द के तीन अक्षरों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की शक्ति समाहित है। भैरव शिव के गण और पार्वती के अनुचर माने जाते हैं। हिंदू देवताओं में भैरव का बहुत ही महत्व है। इन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है।

एक बार सुमेरु पर्वत पर बैठे हुए देवताओ को प्रणाम कर ऋषियों ने उनसे पूछा – हे प्रभु ! आप मैं सबसे बड़ा कौन है ? उस समय भगवन शंकर की माया के वशिभुत होकर ब्रहमाजी ने अहंकर मे भरकर कहा – ऋषियों ! इस सम्पूर्ण द्रश्यमान सृष्टी को उत्पन्न करने वाला मैं ही हु | मुझे किसी ने उत्पन्न नहीं किया , मैं ही सर्व शक्तिमान हूँ मैं ब्रह्मा हूँ | बह्माजी के ये अहंकार पूर्ण वचन सुन भगवान नारायण के अंश ऋतू को क्रोध आ गया | ऋतू के कहा – ब्रह्माजी ! आप अज्ञानता वश ये वचन कह रहे हैं सम्पूर्ण संसार का पालन कर्ता मैं नारायण का अंश हूँ | अत स्वयं का बड़ा समझने की भूल मत करो |

दोनों वेदों के पास गये और पूछा – आप हमारे संदेह का निवारण करो हम मैं से बड़ा कौन हैं ? यह सुन विचार कर ऋग्वेद ने कहा जिससे सबका जन्म हुआ हैं वे एकमात्र रूद्र ही सर्वशक्ति मान हैं | यजुर्वेद ने कहा – जिनका ध्यान ऋषि मुनि निसदिन करते हैं वे एकमात्र शिव ही हैं | सोमवेद ने कहा – जिसके प्रकाश से सम्पूर्ण विश्व प्रकाशित हैं योगीजन जिनका ध्यान लगाते हैं सारा संसार जिनके भीतर हैं वे शिव ही हैं अथर्ववेद ने कहा – जो अपने भक्तो पर अति शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं उनके सभी कष्टों को हर लेते हैं वे भगवान शंकर ही हैं |

माया के वशीभूत ब्रह्माजी को यह तर्क उचित नहीं लगा वे अत्यधिक विचलित हो गये तभी एक घटना घटी ब्रह्माजी के मस्तक से एक दिव्य ज्योति उत्पन हुई उस ज्योति से उत्पन्न पुरुष को देखकर ब्रह्माजी का पांचवा मस्तक अत्यंत क्रोधित होकर बोला तुम कौन हो तभी वह बालक रूप में परिवर्तित हो गया और रुदन करने लगा तब ब्रह्माजी ने यह जानकर की ये बालक मेरे तेज से उत्पन्न हुआ हैं यह वरदान दिया की तुम मेरे मस्तक से प्रकट होकर उत्पन्न हुए इसलिए तुम्हारा नाम भैरव होगा तुममे सम्पूर्ण विश्व के भरण पौष्ण का सामर्थ्य होगा तुमसे काल भी भयभीत होगा इस कारण तुम्हे काल भैरव के नाम से भी जाना जाता हैं | काशी पूरी में जो भी व्यक्ति पाप करेगा उसका लेखा जोखा तुम स्वयं रखोगे चित्रगुप्त काशी वासी का लेखा जोखा नहीं रखा करेंगे | ब्रह्मा के वरो को ग्रहम करने बाद भैरव नाथ ने ब्रह्माजी के पांचवे सिर को काट दिया क्यों की उसने शिवजी की निंदा की थी ब्रह्माजी का सिर काटने के कारण उन्हें ब्रह्म हत्या का पाप लगा | तब ब्रह्माजी को अपने अपराध का ज्ञान हुआ और ब्रह्माजी ने शिवजी की आराधना विष्णु भगवान ने भी शिवजी की स्तुति की तब भगवान शिव ने प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी , विष्णु भगवान को अभय वरदान दिया | ब्रह्मा जी ने भैरव नाथ को आज्ञा दी की तुम मेरे पांचवे सिर को हाथ में लेकर भिक्षा याचना करते हुए भक्तो के कष्टों को हरो और ब्रह्म हत्या के पाप का प्रायश्चित करो | ब्रह्महत्या के पाप के कारण लाल वस्त्र धारण की हुई भयंकर स्त्री भैरव नाथ के पीछे दौड़ने लगी तब भगवान शिवजी ने भैरव नाथ से कहा की आप काशी चले जाये और वही पर काशी के कोतवाल बनकर रहे | भैरवनाथ जी ने वैसा ही किया और काशी पहुंचकर ब्रह्माजी का सिर हाथ से छुट गया और भैरव नाथ ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त हुए | जिस स्थान पर ब्रह्माजी का कपाल गिरा वह स्थान ' कपाल मोचन ' के नाम से विख्यात हुआ | ऐसी मान्यता हैं की मार्गशीर्ष की अष्टमी तिथि को भैरव जी ने ब्रह्माजी के अहंकार का नाश किया था इसलिए इस दिन को भैरव अष्टमी के नाम से जाना जाता हैं जो भी भक्त जन इस दिन भैरव नाथ की उपासना करते हैं उसकी सभी मनोकामनाए पूर्ण हो जाती है

कालभैरव के पौराणिक तथ्य जानिए... भैरव कलियुग के जागृत देवता हैं। शिव पुराण में भैरव को महादेव शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है। भगवान शंकर के अवतारों में भैरव का अपना एक विशिष्ट महत्व है। तंत्राचार्यों का मानना है कि वेदों में जिस परम पुरुष का चित्रण रुद्र में हुआ, वह तंत्र शास्त्र के ग्रंथों में उस स्वरूप का वर्णन 'भैरव' के नाम से किया गया, जिसके भय से सूर्य एवं अग्नि तपते हैं। इंद्र-वायु और मृत्यु देवता अपने-अपने कामों में तत्पर हैं, वे परम शक्तिमान 'भैरव' ही हैं।

तांत्रिक पद्धति में भैरव शब्द की निरूक्ति उनका विराट रूप प्रतिबिम्बित करती हैं। वामकेश्वर तंत्र की योगिनीह्रदयदीपिका टीका में अमृतानंद नाथ कहते हैं- 'विश्वस्य भरणाद् रमणाद् वमनात्‌ सृष्टि-स्थिति-संहारकारी परशिवो भैरवः।' भ- से विश्व का भरण, र- से रमश, व- से वमन अर्थात सृष्टि को उत्पत्ति पालन और संहार करने वाले शिव ही भैरव हैं। तंत्रालोक की विवेक-टीका में भगवान शंकर के भैरव रूप को ही सृष्टि का संचालक बताया गया है। श्री तत्वनिधि नाम तंत्र-मंत्र में भैरव शब्द के तीन अक्षरों के ध्यान के उनके त्रिगुणात्मक स्वरूप को सुस्पष्ट परिचय मिलता है, क्योंकि ये तीनों शक्तियां उनके समाविष्ट हैं- * 'भ' अक्षरवाली जो भैरव मूर्ति है वह श्यामला है, भद्रासन पर विराजमान है तथा उदय कालिक सूर्य के समान सिंदूरवर्णी उसकी कांति है। वह एक मुखी विग्रह अपने चारों हाथों में धनुष, बाण वर तथा अभय धारण किए हुए हैं। * 'र' अक्षरवाली भैरव मूर्ति श्याम वर्ण हैं। उनके वस्त्र लाल हैं। सिंह पर आरूढ़ वह पंचमुखी देवी अपने आठ हाथों में खड्ग, खेट (मूसल), अंकुश, गदा, पाश, शूल, वर तथा अभय धारण किए हुए हैं। * 'व' अक्षरवाली भैरवी शक्ति के आभूषण और नरवरफाटक के सामान श्वेत हैं। वह देवी समस्त लोकों का एकमात्र आश्रय है। विकसित कमल पुष्प उनका आसन है। वे चारों हाथों में क्रमशः दो कमल, वर एवं अभय धारण करती हैं। स्कंदपुराण के काशी-खंड के 31वें अध्याय में उनके प्राकट्य की कथा है। गर्व से उन्मत ब्रह्माजी के पांचवें मस्तक को अपने बाएं हाथ के नखाग्र से काट देने पर जब भैरव ब्रह्म हत्या के भागी हो गए, तबसे भगवान शिव की प्रिय पुरी 'काशी' में आकर दोष मुक्त हुए। ब्रह्मवैवत पुराण के प्रकृति खंडान्तर्गत दुर्गोपाख्यान में आठ पूज्य निर्दिष्ट हैं- महाभैरव, संहार भैरव, असितांग भैरव, रूरू भैरव, काल भैरव, क्रोध भैरव, ताम्रचूड भैरव, चंद्रचूड भैरव। लेकिन इसी पुराण के गणपति- खंड के 41वें अध्याय में अष्टभैरव के नामों में सात और आठ क्रमांक पर क्रमशः कपालभैरव तथा रूद्र भैरव का नामोल्लेख मिलता है। तंत्रसार में वर्णित आठ भैरव असितांग, रूरू, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण संहार नाम वाले हैं। भैरव की आराधना में कठोर नियमों का विधान भी नहीं है। ऐसे परम कृपालु एवं शीघ्र फल देने वाले भैरवनाथ की शरण में जाने पर जीव का निश्चय ही उद्धार हो जाता है।


अन्य कथा के अनुसार :-

भैरव उत्पत्ति : उल्लेख है कि शिव के रूधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई। बाद में उक्त रूधिर के दो भाग हो गए- पहला बटुक भैरव और दूसरा काल भैरव। मुख्‍यत: दो भैरवों की पूजा का प्रचलन है, एक काल भैरव और दूसरे बटुक भैरव। पुराणों में भगवान भैरव को असितांग, रुद्र, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण और संहार नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव के पांचवें अवतार भैरव को भैरवनाथ भी कहा जाता है। नाथ सम्प्रदाय में इनकी पूजा का विशेष महत्व है।

लोक देवता : लोक जीवन में भगवान भैरव को भैरू महाराज, भैरू बाबा, मामा भैरव, नाना भैरव आदि नामों से जाना जाता है। कई समाज के ये कुल देवता हैं और इन्हें पूजने का प्रचलन भी भिन्न-भिन्न है, जो कि विधिवत न होकर स्थानीय परम्परा का हिस्सा है। यह भी उल्लेखनीय है कि भगवान भैरव किसी के शरीर में नहीं आते।

पालिया महाराज : सड़क के किनारे भैरू महाराज के नाम से ज्यादातर जो ओटले या स्थान बना रखे हैं दरअसल वे उन मृत आत्माओं के स्थान हैं जिनकी मृत्यु उक्त स्थान पर दुर्घटना या अन्य कारणों से हो गई है। ऐसे किसी स्थान का भगवान भैरव से कोई संबंध नहीं। उक्त स्थान पर मत्था टेकना मान्य नहीं है।

भैरव मंदिर : भैरव का प्रसिद्ध, प्राचीन और चमत्कारिक मंदिर उज्जैन और काशी में है। काल भैरव का उज्जैन में और बटुक भैरव का लखनऊ में मंदिर है। काशी विश्वनाथ मंदिर से भैरव मंदिर कोई डेढ़-दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दूसरा नई दिल्ली के विनय मार्ग पर नेहरू पार्क में बटुक भैरव का पांडवकालीन मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध है। तीसरा उज्जैन के काल भैरव की प्रसिद्धि का कारण भी ऐतिहासिक और तांत्रिक है। नैनीताल के समीप घोड़ा खाड़ का बटुकभैरव मंदिर भी अत्यंत प्रसिद्ध है। यहां गोलू देवता के नाम से भैरव की प्रसिद्धि है। इसके अलावा शक्तिपीठों और उपपीठों के पास स्थित भैरव मंदिरों का महत्व माना गया है।

काल भैरव : काल भैरव का आविर्भाव मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को प्रदोष काल में हुआ था। यह भगवान का साहसिक युवा रूप है। उक्त रूप की आराधना से शत्रु से मुक्ति, संकट, कोर्ट-कचहरी के मुकदमों में विजय की प्राप्ति होती है। व्यक्ति में साहस का संचार होता है। सभी तरह के भय से मुक्ति मिलती है। काल भैरव को शंकर का रुद्रावतार माना जाता है।

काल भैरव की आराधना के लिए मंत्र है- ।। ॐ भैरवाय नम:।। बटुक भैरव : 'बटुकाख्यस्य देवस्य भैरवस्य महात्मन:। ब्रह्मा विष्णु, महेशाधैर्वन्दित दयानिधे।।' - अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, महेशादि देवों द्वारा वंदित बटुक नाम से प्रसिद्ध इन भैरव देव की उपासना कल्पवृक्ष के समान फलदायी है। बटुक भैरव भगवान का बाल रूप है। इन्हें आनंद भैरव भी कहते हैं। उक्त सौम्य स्वरूप की आराधना शीघ्र फलदायी है। यह कार्य में सफलता के लिए महत्वपूर्ण है।

उक्त आराधना के लिए मंत्र है- ।।ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाचतु य कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ।।

भैरव तंत्र : योग में जिसे समाधि पद कहा गया है, भैरव तंत्र में भैरव पद या भैरवी पद प्राप्त करने के लिए भगवान शिव ने देवी के समक्ष 112 विधियों का उल्लेख किया है जिनके माध्यम से उक्त अवस्था को प्राप्त हुआ जा सकता है।

भैरव आराधना से शनि शांत : एकमात्र भैरव की आराधना से ही शनि का प्रकोप शांत होता है। आराधना का दिन रविवार और मंगलवार नियुक्त है। पुराणों के अनुसार भाद्रपद माह को भैरव पूजा के लिए अति उत्तम माना गया है। उक्त माह के रविवार को बड़ा रविवार मानते हुए व्रत रखते हैं। आराधना से पूर्व जान लें कि कुत्ते को कभी दुत्कारे नहीं बल्कि उसे भरपेट भोजन कराएं। जुआ, सट्टा, शराब, ब्याजखोरी, अनैतिक कृत्य आदि आदतों से दूर रहें। दांत और आंत साफ रखें। पवित्र होकर ही सात्विक आराधना करें। अपवि‍त्रता वर्जित है।

भैरव चरित्र : भैरव के चरित्र का भयावह चित्रण कर तथा घिनौनी तांत्रिक क्रियाएं कर लोगों में उनके प्रति एक डर और उपेक्षा का भाव भरने वाले तांत्रिकों और अन्य पूजकों को भगवान भैरव माफ करें। दरअसल भैरव वैसे नहीं है जैसा कि उनका चित्रण किया गया है। वे मांस और मदिरा से दूर रहने वाले शिव और दुर्गा के भक्त हैं। उनका चरित्र बहुत ही सौम्य, सात्विक और साहसिक है।

उनका कार्य है शिव की नगरी काशी की सुरक्षा करना और समाज के अपराधियों को पकड़कर दंड के लिए प्रस्तुत करना। जैसे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, जिसके पास जासूसी कुत्ता होता है। उक्त अधिकारी का जो कार्य होता है वही भगवान भैरव का कार्य है।

नवरात्रि कालभैरव दर्शन